{ कुद्धज्त ककः तन्ः कः )

विणा मारोचकश्यपेनोपदिष्ठ तच्चरण दुद [चर्ण सात्म्य वसचता

तद्धश्येन वात्स्येन प्रतिसस्छृता।

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नेयालराजरारुरणा षं० हेमराजशम॑सा र्खितेन विस्ततन उपाद्धातेन सिता

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अायुकेदालङर श्रीसत्यपाल भेषगाचायं-

छतथा

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विन्योतिनीः' दिन्दीत्याख्यया, उपद्धातहन्दी- भाषानुचवादेन समुदसिता

नलति 0 -0-

से

` चोखम्बा-संस्करत-सीरिज, वनारस-

सन्‌. १९५द्‌

प्रकाशकः-- जथकूष्णदास हरिदास गु चौखम्बा संस्कृत सीरिज्न आफिस, पो० बाक्स नं० ८; बनारस

पुनसुद्णादिकाः सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकाधीनाः वि० संचत्‌ २०१०५

खद्रकः-- विधाविलास प्रेस, ननारस-१

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पाठकों के सम्मुख आयुवेद के प्राचीन भ्रन्थ काश्यपसंहिता का हिन्दी अनुवाद उपस्थितं करते हुए मुञ्चे प्रसन्नता है अनुवादक के सामते प्रधान दृष्टिकोण प्रन्थ के सूल विषयक स्पष्ट करना होता है साथ ही विषय का व्यतिक्रम हो यद भी उप्ते भ्यान मेँ रखना पड़ता है इन दोनों बातों का सामञ्खस्य रखने का मने अपनी ओर से यथाशक्ति प्रयत्न किया है काश्यपसंहिता आयुर्वेद का एक अस्यन्त प्राचीन प्रन्थ हैः | यह्‌ चरक तथा सुश्रुत का ही समकन्न माना जता है इसकी उपलब्धि नेपाल मँ अभीतक खरिडितरूप मेदी हई है। कालक्रम से मरि अनेक प्राचीन आयुर्वेदिक तथा अन्य प्रन्थ मी रिलु्र हो चुके हैँ इन बिद म्रन्थो मे से जो अनेक मन्थ समय पर उपलब्ध हुए हँ उन्दी मेँ से काश्यपपंदिता भी एक हे यद्यपि यद्‌ ग्रन्थ अभी तक पूणक्प से शं मिला हैः तथापि जजरित एषं खरिडित रूप में उपलब्ध होने पर मी यह्‌ हमर महान्‌ आयुर्द कोपर की अप्रूल्य निधि समी जानी चाहिये तथा समय प्रबाहु से भविष्य मं इस मन्थ के अ्रशिष्ट अंशो की उपलब्धि की आशा भी रखनी चाहिये | इस न्थ का मुख्य विपय कोमारथत्य हे अर्थात्‌ इसमे वालको के रोगः उनका पालन पोषण, स्तन्य- शोधन एं धात्रीचिकित्सा आदि का विशद वणेन मिलता हे कोमारशरत्य अष्टाङ्ग आयुर्वेद का एक अवि. भासय अङ्क है इसके अभाव मे अष्टाङ्ग आयुत्रद पूण नदीं कहा जा सकता जिस प्रकार आयुवेद के आठ अङ्गो मे से इस समय शालाक्यः पिष, तथा मूतविद्या आदि केवल नाममात्र को ही अशिष्ट है उसी प्रकार अरङ्ग आयु्ैद का कौ मारभरस्य सम्बन्धी विषय भी इस भ्न्थ के उपलब्ध होने से प्तक केवल नाममात्र को हीथा। इस कोमारभ्रूव्य का प्रधान स्माचायं जीवक माना जाता है। अभी तक इस जीवक का कोई भी विरोष परिचय हमे उपलव्य नदीं था इस न्थ के उपलब्ध दो जाने से जीवक के विषय भी हमें अनेक प्रकार का ज्ञान मिल जाता दै इससे उसके पिता, जन्मस्थान एवे आचाय का परिचय मिलता है कौमार- भ्रत्य के प्रधान आचाय जीवक, तथा इस संहिता के विषय मे उपोद्धात भे विशेष वणेन किया गया है इसके विषय मेँ मुञ्चे पुनः धिशेष करं नदीं कहना दै इस पन्थ मँ बालकों के विषय मँ अनेक देसी बातें दीद दै जो अन्य प्राचीन आयुर्वद्विक प्रन मेँ साधास्मतया देखने को नहीं मिलती उदाहरण के लिये वालको के लेहन, सल्निपात, फक्षरोग आदि का इसमे विशेष वणेन किया गया है बालकों के दन्तोर्पत्ति का इतना विशद वर्णन अन्यत्र कदी नहीं मिलता हे स््रेदन के भरकरण मे अत्यन्त चयोदे बालकों के लिये अन्य स्वरेदो साश्र विशेषरूपं से दस्तस््ेद का विधान दिया गया हस्तस्रेद्‌ से अभिप्राय हाथों को गमं करके उनके द्वारा स्रेदन दने से द्धोदे बालक अत्यन्त नाज्जुक होते हँ थोड़ी सी भी अधिक गरमी से बालकों के उष्णता के कन्दर विचलित हो जति हँ इस लिये उन्हं स्वेदन अध्यन्त सावधानी से देने की द्रावश्यकता होती है दस्तस्ेद से यह भय नहीं रहता, इसमें हार्थो द्वारा उष्णता का नियन्त्रण सुविधापूेक किया जा सकता है इसके अतिरिक्त अन्य अन्था मे संच्तेप मँ दिये हुए वेदनाध्यायः लक्तणाध्याय, बालग्रह आदि का इसमे धिशद घर्णन किया गया है रक्तगुल्म तथा गभ॑ में प्रायः श्रम उत्पन्न हो जातादै। इनकी सेदक परीद्धा इस दिता मे अयन्त विस्तार से दी गईं विषम च्वरके वेगों के विषय में यहां एक्‌ विलङ्कल नवीन शंका उपरिथत करके उसका युक्ति पृक बड़ा सुन्दर उत्तर दिया गया हे विषमञ्वर के अन्येयष्क, तृतीयक तथा चतु्क के समान अन्य भेद क्यों नदीं होते अर्थात्‌ जिस प्रकार विषमञ्वर्‌ प्रति- दिन, तीसरे दिन एं चौथे दिन होता है उसी प्रकार पांचवें तथा छठे दिन भी इसके वेग स्यो नहीं होते ¦ इसका उत्तर दिया हैः कि इस वरिषसञ्यर के आमाशय, छाती; कर्ठ तथा सिरयेचारदही स्थान इनके अतिरिक्त इतका कोट स्थान नदीं है इसलिये अन्य स्थानामाप्र से इसके अन्य वेग नहीं होते इन उपर्युक्त स्थानो मे से आमाश्यमें दर्प के पहुंचने परञ्र का वेगहोतादहे। एकस्थान से दृत्तरे स्थान तक दोप को प्ुचने मे एक अदोरात्र लगता है अर्थात्‌ अन्पेद्युष्क का स्थान षछछाती हैः। हाती सेआमाशय तक दोप पहनने मे एक अहोरात्र लगता दै इप्तलिये अन्येयुष्क का वेग र४्षंटेमं होता ठृतीयक का स्थान कर्ठ माना गया है करट से द्याती तक एक अहोरात्र तथा हावी से आमाशय तक पहुंचने मँ

( २)

` दृखरा अहोरात्र लगता इसलिये तृतीयक का वेग तीसरे दिन होता है इसी प्रकार चतुर्थक का स्थानं सिर दः उसे आमाशय तक पहं चने मे तीन अहोयत्र लगते अर्थात्‌ चतुथेक का वेग चौथे दिन होता दै इनके अतिरिक्त धिषमञ्वर का कोई श्थान नहीं हे इसलिये चौथे दिन कै बाद इसका कोटं वेग नीं होता यद्‌ अयन्त युक्तिसंगत उत्तर दिया गया हे इसी प्रकार अन्य भी बहुत से नवीन षिषय इस संहिता मेँ दृष्टिगोचर होते दै इस प्रकार संपूणं रष्ियां से कौमारश्रूत्य के विषय में यह्‌ एक पूणं प्रामाणिक ग्रन्थ माना जा सकता दै अनेक वर्षो से मेरौ इच्छा इसके अनुवाद करने की थी चोखम्बा संस्कृत पुस्तकालय के उ्यवस्थापकां के सस्मयत्नों से उस इच्छा को पूणे कर्ने का अवसर मद्ये उपलन्ध हो गया इस भ्रन्थ के साथ राजगुरु हेमराज जी ने जो एकर अत्यन्त षिद्रत्तापूणे एवं सारगर्भित उपोद्धात लिख दिया है उससे तो इस भरन्थ की उपादेयता ओर मी बद गर हे इसमे आयुर्वेद का विस्ठृत इतिहास एवं विकासक्रम दिया गया दै तथा आयुर्वेद के प्रधान भ्न्थों एवं उनके आचार्या का भी विस्तृत विवेचन किया गया है परन्तु यह्‌ उपोद्धात संस्कत भाषा मे लिखा होने से आयुवेद के अनेक एसे प्रेमी; जो संस्कृत से अनभिज्ञ &ै, इससे विरेष लाभ नदी उठा पाते, इसी लिये इस संहिता के अनुवाद का प्रशन जब मेरे सामने आया तो मूल भन्थ के साथ उपोद्धात का अतुवाद्‌ करना भी गने आवश्यक समा, इससे यदपि ग्रन्थ का कलेवर अधश्य बद्‌ गया है परन्तु इससे इसकी उपयोगिता निर्विवाद्‌ बद्‌ गह है

| | पुञ्य हेमराज जी ने सहषं अत्यन्त उदारतापूषेक प्रकाशक को सानुवाद्‌ उपोद्धात दापने की खीषरति प्रदान करदी इसके लिये मैँ तथा प्रकाशक उनके अत्यन्त आभारी हे चौखम्बा संस्कत पुस्तकालय के उयवस्थापक श्री जयकृष्णदास हरिदासजी गप्र मी अत्यन्त घन्यवाद्‌ के पात्र हैँ जिन्होने इस महान्‌ अथे-संकट काल मेँ भी आर्थिक लोलुपता से चिरत होकर सेवाभाव से दी इस भरन्थ का प्रकाशन कर आयुर्वेद जगत की एक महान्‌ तति की पूतिकरदी है| श्री अत्रिदरेवजी गप्र का मँ अस्यन्त आभारी द्रुं उन्दींकी निरन्तर प्रेरणा का फल है कि मै आप लोगों के सम्मुख इसका अनुघाद उपरिथत कर सका हूं, उनको भँ धन्यवाद तो नही दे सक्ता क्योकिवे मेरे गुरु काश्यपसंहिता का अनुवाद करना मेरे लिये सरल नदीं था क्योकि यह एक अत्यन्त प्राचीन भ्रन्थ जिसमे स्थान परं अनेक तिषय एवं शच्द एेसे आये हुए है जो बिलकुल अप्रसिद्ध एवं अस्पष्ट है इनके अतिरिक्त सबसे अधिक कटिनाई जो थी वह्‌ यद्‌ फि यह्‌ मन्थ स्थान पर खण्डित अवस्था मेँ हे इन कठिनाइयों के होते हुए भी प्रकाशक के द्वारा निरन्तर प्रोत्साहन मिलते रहने से दी मै इस काये को पूणं कर सका हँ अतः उनका अत्यन्त कृतज्ञ हं | इस संहिता के अनुबाद काय मे सज्ञे बहुत से व्यक्तियों से अत्यन्त श्चमूल्य सहायता प्राप्न हुई दै उनको भै हृदय से धन्यवाद देता द्रं गुरुकुल आयुर्वेद महाविद्यालय के वयोवृद्ध उपाध्याय श्री कतिराज हरिदास जी शाद्धी न्यायतीथे का भँ अत्यन्त आभारी ह्रं जिनसे सुद्धे समय पर बहुमूल्य सहायता मिलती रही है श्री पं० हरिदत्त जी वेदालङ्कारः श्री पं० रामनाथ जी वेदालङ्कार तथा श्री पठ शंकरदेव जी विद्या लङ्कार को भी भँ धन्यवाद देता हं इनसे हर प्रकार की सहायता प्राप्त होती रही है ऋषिुल आयुर्वेद कालेज के विद्यार्थी छऋषिप्रकाश को भी हम धन्यवाद्‌ दिये निना नहीं रह सकते जिन्होनि हमारे इस काये मे अत्यन्त सहयोग प्रदान किया अन्त मँ सुञ्चे अपनी धमेपतंनी श्रीमती सुशीलादेवी को भी अवश्य धन्यवाद देना चाहिये जिनकी आत्मिक सदायता एवं इच्छाशक्ति के चिना यह्‌ कायं पुरा नहीं हो सकता था ` अन्त मेँ हिन्दी अनुबाद के विषय मँ भँ इतना अवश्य कह देना चाहता कि इस संहिता में एेसे विषय आये हुए हँ जो अत्यन्तं अस्पष्ठ एवं संद्ग्ध बहुत प्रयत्न करने पर भी मै उनको स्पष्ट नहीं कर सका उन संदिग्ध स्थलों का हमने अन्य करई बद्ध वेदयो के निरदेशानुसार केवल शब्दानुवाद्‌ मात्र कर दिया है विद्धान्‌ पाठक उन संदिग्ध स्थलों के विषय मेँ मुञ्चे अपने धिचार लिख सदे तो उनका आभारी होते हुए उन स्थलों का अगले संस्करण मे स्पष्ट करने का प्रयत्न करूंगा |

धस एतीय, ग. नितेद्क-- . विर संनत्‌ २०१५ ~ .. सत्यपाल आयुरवेदालङ्कार

सेस्कृत-उपोद्धातस्य संक्चिक्षा विषयानुक्रमणिका

विषयाः उपोद्धातप्रस्तात्ः

सोपक्रप श्रायुषेदपरिच्छेदः

श्रायुवे विषयोपन्थास ्रायुवद्स्य प्राचीनत्वम्‌ श्रायुर्चेदः

वेदायुचदयोः संबन्धः वेदे श्रायुवंदीया चिषयाः

श्रा जाय पर्डि>ढो ग्रन्थवस्चिग्रसहितः।

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श्रायुवेंदस्य प्रकाशः, श्राचार्यश्च त्रेय -श्रुतपंहिते ˆ" मेडसंहिता

हारीतसंहिता

नचोपलब्धेय काश्यपसंहिता कश्यपस्य विमशंः

जीवकस्य विमशंः ` * वातस्य

अस्य भ्रन्थ्य संहितात्वं तन्त्रत्वं करयपात्रेयमेडख॒श्रुतम्रन्थानां ठलनाविमशंः

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मस्य म्रन्थस्य चिषयः

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प्रसद्रस्रतानि श्माचार्यान्तराणि `" ` धन्वन्तरिर्दिवोदासश्व

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द्मात्रेयः

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संस्कार्त॒लनादिसखदहितो बिषयपरिच्छैद

ग्रतिसस्कार °

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ग्रीसःरतीयवेद्यकयोः मायिको विषयस॑वाद्‌्ः -* ` म्राचीनप्रीसवेयकसंप्रदायाः -- यवनेभारती पविषयाणातुपादानम्‌ भारतीयविदुषां भ्रीसोपगमः “`` ्मलेवजेन्डरद्रारा भारतालेकःसारः भारताक्ेकश्रसारे शोकशिलालेखः ` ˆ ˆ ग्री सभारतयोः पुराकालात्‌ संबन्धः * ˆ * ` ग्रीसे शच्वेयकस्य पश्चात्‌ प्रचारः ` * प्राचीनमिघ्रे मेषज्यविक्ञानम्‌ असीरियबेविलोनिययोः पूं भेषज्यज्ञानम्‌

मिभ्रवेबिल्लोनियेरानचीनेषु भारतीयशब्दादिसाम्यम्‌ पाचीनभारतस्य देशान्तरसंबन्धः ` * ...

न्वन्तर्थादीनां पौक॑कलिकता -** भारतीयखोतसो देशक्नालव्या्तिः ˆ". `" पौष्कलावतकरवीय)रधायाचार्येष वितकंः ` ` ˆ

< भारतीयभूगभ॑तः प्राचीन मेषज्यदृ्टिः - प्राचीनतत्तरेशभेषज्यविमशंस्यावश्यकता ˆ * *

उपसंहारपरिख्तेदः।

म्राचीनाचार्याणां गौरवासुसंघानम्‌ प्राचीनग्रन्थानां विलोपो रक्षा `“

मेपालग्रन्थमालायाः प्रथमप्रकाशः साहाप्यसमादरः `“ " ““ परिरिप्‌।

ज्वरसमुचये काश्यपसंहितायाः श्लोकर्सवादः

काडरयपसटिताश्गं समागतान्याचायान्तर.णां नामानि

नाम. दाश्चाहः

भागवः ्रमितिः ` "` वार्योविद: | काङ्कायनः " “^ कृष्णो भरदाजः " दिरण्याक्षः

वैदेहो निमिः

धन्वन्तरिः ^

पु. २२ २९

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नाम. |

गार्थः ५०७ ` ` ००, ००१ माठरः ,.५ ... .,, भत्रे पुनः ,,. „० =* पाराशयंः " " `“ " * सलः ... ,,. -., वृद्धकाश्यपः `“ " "" * " वैदेष्ो जनकः ५०० ०» ००५ वात्स्यः ` *** 9 9 2 ्मनायासो यक्षः 9० (ह) ^ $

विषया त्र देशविशेषनिदेशः “° ° ०० | & भारतीयभेषन्यसमर्थनपरिच्छेदः भारतीयभैषज्यविदयायाः पाचीनत्वम्‌" ˆ ` ... हिपोक्रिटससम्बन्धी विमशैः ~ ° * .,,

२२९६

विषय ° उपोद्धात प्रस्ताव `“ " ' सोपक्रस श्राय॒वद्‌ परि्दिद्‌

उपक्रम सित श्रायर्वेद सम्बन्धी विवरण श्मायर्चैद की प्राचीनता | प्रायुचेद | # वेद तथा श्मयुैद का परस्पर सम्बन्ध ˆ" > वेद में रायु सम्बन्धी विषय ^ ° ५,

2 ग्रन्थपरियय सहित शाचायं परिचयं

प्रायु्वैद्‌ का प्रकाश शओरौर आाचायं | ११ द्मात्रेय तथा सुश्रुत संदिताएं ° १४ मेड संदिता " “* १५ टारीत „, "** "^,

नवीनोपलय्ध काश्यप सरिता" ˆ [र

कश्यप सम्बन्धी विमशं "** ` १६ जीवक सम्बन्धी विवार "*" `" २१ वातस्य निहपण , " २३ म्रसदवश निदष्ट अन्य आचार्यों कादिवरण `“ २८ धन्वन्तरि तथा दिवोदास `" “*" र,

युत | “^ ^ ३२ द्मात्रेय | ००, ++ 9 द्रभिवेश # # 9 चरका --* ` ^ ,

चायोर्विद, दारुवाह, नप्नजित्‌ तथा भंड " " ५१ रघ > ग्रन्थ ` “* ५२

संस्कःण. को तुलना तथा तत्सम्बन्धी विषय

्रतिस॑स्कार ५३ इस ग्रन्थ का संहितात्व तथाः तन्त्रह्व ` ˆ" ६३, कश्यप, श्रात्रेय, मेड तथा पुश्चुत के ग्रन्था की परस्पर तुलना इस मन्थ का विषय "“ * * ६७ इस मेँ ध्याये हृए देशो का चणेन "** ७०

~ [कि- - ष) 81 1१५४ 1 सा श्तु ५८ १५ ५44५१९५६ +

५. ॥*' पो कोति पुनेन लाकावनणन्न

| विषय . ` | पू० भातीय मेषज्य सपमरथन परिर्चेद्‌

भ्यरतीय चिकित्सा का वणन ' " ““ . ७२

हिपोक्रिरक्त सम्बन्धी विचार " ८२

ग्रस तथा मारत कौ चिक्रिला मे समानताएं `“ ८४

प्राचीन ग्रीप वेयक संप्रदाय -** ९०

ययन द्वारा सारतीय विषयो का ग्रहण " * ९२

स्परतौय द्िद्रानो करा ग्रीस में जाना ˆ““ ' ६४

लेग्जेण्डर द्वारा <स्तीयज्ञान का प्रपारं "८" ९५ भारतीय श्मालेकके म्रसारमे अ्रशक.-के.शिलासेख का स्थान९७ ग्रीस तथा मारत का प्राचीन काल से सम्बन्ध 7** ९८

म्री मं शद्चिक्रिःसाका वाद्में प्रचार “ˆ १०० सीरिया तथा वेविललोनिया में प्राचीन काल्ञ सें

सेषज्य विषयक ज्ञान ˆ“ "** १०४ मिघ्र, वविङ्ेनिया, रान, चीन शादि दैशासं

(रतीय शब्दा करा स्प नि ५, प्रायीन : रत कराच्यन्य दंशा 7 सथ दम्वन्ध्‌ः*“ १०५ धन्वःतर्‌ सादिया कौ प्राचीनता “** १०७ प्रत्येक देथ तथा कालमें भरतीव्र खोता करौ व्याप्नि १०८ पौप्कलावत, कर्रीये तथा अमौरप्रं प्रादि स्ाचार्याके

विषय में चिचार " " > वेदिक सािरयमूलक मारतीय मेषस्य ११२ |

भारतीय भगम के यनुसनार प्राचान मैषस्यविषयक विमश्वं ११२ भिन्नर् देशोके प्राचीन भषञ्यके चिमर की ्माचश्यरक्ता११४ उपसदा परिच्द्‌।

प्राचीन श्राचार्यो क्रा गौर -“*, ११५ प्राचौन मन्थोकालेपश्चौर उनक्रौरशा ˆ“ ११६ रपा ग्रन्थमाला का प्रथम प्रकाश ““* ११८ छरतज्ञता भरकाशन " " " "“ " , परिशिष्ट | ज्वरसमुचय मेँ काश्यपसंदिता के मिलने चाले श्लोकं १२०

प्राप्तस्यानम्‌

चाछम्बा-सस्कत-इरतकाटय पो० वा० नं० ८, बनारस-

आयुष्यास्नायमास्नाय नानोन्मेपेर्विवध्यं |

जगतः श्रेयसे सक्ताः स्मरणीया दयामयाः यस्ातिभरसासिक्त आयुषदमहातसरू फलत्यय्ापि जगति महात्मानो जयन्ति ते २॥

+

यस्किमपि प्रे्ञावता पुरः प्रदश्य॑मानं किमिदं किमथंमितीद.

प्रथमां निन्ञासां स्वतः समुत्थापयति यावद्धि उपोद्धात तन्नावगम्यते तावन्न प्रवतंते सविकेषा दृष्टिः | परीत्तक्छणाम्‌ खामान्यतोऽवगते विरेषलिज्ञा- |

( ) सोपक्रमं आयुवेदपरिच्छेदः--

निश्वप्रचमेवेदं विपश्चितां सुखमेव परमः पुरूषाथं इति तर्च सुखं दुःखनिच्रत्यात्मकं दुःखविरोधिभा-

सोन्मुखीकरोति खोकान्‌ सति हि बाह्ये सामा- | भरायुचद्‌- वान्तः वेति द्विधा निरूप्यते विह्वद्धिः उभय- न्यविक्लानेऽमीप्सितमरथसुपादातुं, जिहासितमपार्थं परिह | विषयो- थाऽपि तष्टम्धये सवषां समीहा सति हि कद्पते रोकः तामेतामादिमाकाङन्ं प्रशमयितुं ज्ञाखादावनुब- | पन्यासः दुःखे तन्निचरत्तिर्वां सुखं वा नोदेतु प्रमवतिं

न्धनिरदेशवस्मस्तुतम्रन्थसम्बन्धिनोऽन्तरङ्गान्‌ बहिरङ्शच कश्चन | विशेषतो निरीरहिताय्‌ विषयान्‌. भूमिकाप्रस्ताबनादिरूपेणोप- | दुपायेनिवर्तयिषुमिष्यते, आगाम्यपि साधनावरुम्बेन परिह भ्रय्यते नहि कोऽपि सचेता आत्मनो दुःखं समीहते यत्किञ्चन विवेचक्ानां पुरतः कतिपयैः शब्दैः समुपाहर | यावन्तो व्यापारास्तन्निवस्यं सुखं साधयितुं प्रवरव्यन्ते, परं सुख- समीहया प्रवत॑मानोऽप्ययथावेदनेन समुपचारपथं परिहायाप. ¦ चारवत्म॑नि प्रवृत्तो दुःखेन खलीक्रियते रोकः। एतस्येव मार्गा. ¦ छोकाय सर्वाणि श्चाखाणि सवं लोकाश्च प्रावतंन्त प्रवर्तन्ते

हृत्य मन्थः पुरस्कियत इति सञुचितः सम्परतिको विपशित्ल-

ग्रदायः। अञुमाचारमनुरन्धाने चेतसि प्रतिभातमन्यत्न परिष्ष्ट |

रेखनीयं पुरःसरति तत्रास्मिन्युपोद्धाते पञ्च परिच्ठेदा-

१) सोपक्रम आयुर्वैदपरिच्छेदः। (२) आचायेपरिच्छिदो {मन्थपरिचयसहितः। ( ) संसकारतुलनादिसहितो.विषयपरिच्छेदः। (४ ) मारतीयभैषव्यसमथनपर्च्छिदः। (५) उपसंहापरिच्ेदः | ` सिद्ध सिद्धसम्बनधं भरोत नोता मवततते। ` १. सिद्धार्थं सिद्धसम्बन्धं श्रोतु श्रोता प्रवतत राखादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ` ( देखोकवातिकस्योपक्रमे )

मानमाधिमौतिकं, अरहयदषरा्तसविनायकादिकं देवनिकायं ` निमित्तीकरत्य जायसानमाधिदुविकमिति त्रिषु प्रस्थानेषु निभ-

दुभ्खं नाम बाधनालक्षणं सर्वाधिकमप्रियं जगति यदतीतमपि स्मर्यमाणं बाधते, वतंमानमपि यैः केशि.

दुःखं मनःदारीरादिकमात्मानं निमित्तीकृत्य जायमान.

माध्याप्मिकं, पञ्चभूतप्राण्यादिभूतनि कायं निमित्तीकृत्य जाय-

उयते एषु नानाप्रस्थानेषु यं कञ्चन दुःखविश्ेषममिरुचय तत्त. धिदृततिप्रधानोपायप्रव्नेन जआध्यास्मिकानि साङ्कथादिदं- नानि, उपासना्चाखाणि, नीतिभेष्या्ेहिकन्ञाल्ञाणि चाथ

, बन्ति भवन्ति |

& उपोद्धातः

+ +

परमेतान्याध्यास्मिकान्येहिकानि सर्वाणि शल्लाणि शरीरिणां सजीवनसुपरूभ्येव स्वात्मङाभाय कर्पन्ते यः कश्चन सचेता नवनवोर्ाहसम्पन्नः सदुपायान्‌ विक्ञाय तत्प- ख्ष्कितेन वर्त्मना आत्मानञुन्निनीषुः करमेण समीहितं स्थानमा- रों पारथति दुर्जीवनेन स्वरुद्रतिः कियत्याऽपि मात्रया पुरः सर्तंमपारयन्नात्मना कमप्युपयोगं साधयितुं प्रभव तीति श्ारीराच्‌ जीवनोपायान्‌ प्रतिपादयन्छाखं विशेषतः दाखान्तराणासप्युपजीभ्यं भवति प्रथमतः शारीरबाधया विना छता स्थितिरस्माञ्जीवनाहुपेया पेहिकीः माञ्चुष्मिकीश्चो- न्नतीमयति श्चरीरं नाम नानाविधैः स्थूलसूचमातिसुकमैर- वयतैर्महनाभिस्तत्तदशक्चित्राप्रक्रियामिर्यथावद्प्रमेयनैश्वरशिरप- मयं महायन्मिवा वरोक्यते यत्र कचन स्थुरेषु सूचमेषु वांऽलेषु दश्याऽदश्या वा या काचन दिक्रिया समुत्प्यमाना समस्तं शरीर, केवरं शरीरमपि हु तदनुस्यूतं शरीरशरीरि समवायार्मकमन्तरास्मानमपि विकरुभावं प्रापयति शरीरः विक्रियया विश्ियमाणः शरीरी विकखेनान्तरात्मना शेधिल्य- मापन्नो दुःखान्तराण्यमपि निरसितुं भवति शरीरे निवि दुःखान्तराणां परिदारोपाया विधातुं पार्यन्ते, फएरन्ति शरीर एवामयेन विकलर्ताय्युपेते तदनुषङ्गेणान्तःकरणे व्यथिते कठिनतपश्व्यांतीथारनपरोपकारथ्रश्तयो धार्मिका विषयाः शिह्पवाणिज्यवातदिश्ान्तरञ्मणादय आ्थिका उद्योगाः; यथाकाममाहारविहारविषयोपभो गादयः कामिकाः प्रयोगाः, मानसिकविचारविशेषक्रोघरोमायान्तरिकराश्चुदमने. न्दियजयेश्वरभजनादयो मोन्लोपाया भपि यथावत्‌ प्रवत्त॑पितं राक्यन्ते। उन्तमेव--धमाथंकाममो्ताणामारोग्यं मूलसाधनम्‌ः (च. सू. अ. १) इति॥ | [ि ` तदेवभारोग्यपरिष्टुते जी वनतरौ सम्यञ्चि फएरानि फएरन्ती- ति तत्सम्पत्या चिरजीवनाय सुजीवनभावाय श्ारीरब्राधाम- यान्येहिकानि दुःखान्यवश्यं परिहरणीयानि भवन्ति ! शारी. राणि दुःखानि नानाविधरोगास्मना शतधा प्ररोहन्ति ते त्र शतशो रोगा नेकेनोपायेनोपदेशेन वा विज्ञेयाः परिहर- णीया वा भवन्तीति तेषां निब्ृत्तयेऽनुस्पादाय ये याचन्त

उपाया व्यवस्थितयस्तेषां यावदूबुद्धिवरोदयं परिक्तानमाव- श्यकं देहिनाम्‌ .

` तन्न हेया दुःखात्मानो रोगा, तेषां हेतवः ( निदानादीनि ) देयरोगाणां हानं ( निच्रत्तिः ), हाने साधनानि ( मेषजा- दीनि ) चेति चतुर्धां विज्ञातभ्यानि भवन्ति हेयानां स्वरू. पाणि परिचिष्य ज्ञातेस्तदीयहेतुमिः पूर्वमेव परिदहियमागैस्तद- जुत्पत्तये, विन्ञ तेश्च हानसाधनेः कथञ्चनोप्पन्नानामपि तेषां निंद्य भवितव्यम्‌ | |

. . खोकानां श्रेयः साधनतया हितावहेषु विविपेषु ज्ञान. विक्लानप्रमदरेषु स्वो पजीभ्यं यद्‌ विज्ञानर्नं तदेवायर्वेदचिक्तानः मि्युच्यते एतद्रीयं विज्ञानं केवलं स्वस्य एकट्रभ्यक्तिमा. स्म वोपङ्कतये, अपरि च॒ कुटुम्बस्य समाजस्य देशस्याप्युपक्ृ- तथे सञु्तये भवतीस्यवश्यं विज्ञेयं शरीरिभिः, उपदेषटव्यं विज्ञावृभिरिति विशेषतोऽ्थवानस्यावबोध उपदेशश्च ..

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यदा किरु खष्टरा भूतानि भौतिकानि ष्टानि तदात्व एव प्राणिनां दी दीटुप्यसः्नान्यपि विज्ञेयानि

्रायुचेदस्य बभूढधः उद्पन्नमान्रा एव मिथ्योपचारेण वि- पाचीनत्वप्र नष्टः प्राणिनः कथद्रं सर्जनश्रममशवन्तं कुर्युः यथा यथा ते चिरं संततां प्राप्नुवन्ति

तथा तथा सष्टुः समीहितं किमपि सम्पादयितुं पारयेयुः सत्तां रुन्धवन्तोऽपि विकलाङ्गाः कतमस्मे कामाय कल्पेरन्‌ अतः सत्वबखावष्टव्येन सकरी मभावेन चिरमवस्थानमादित एवापेच्यत असिमश्च खटः शिरपश्रपञ्चे चरा अचरा भोक्तारो

मोज्या एवमादयो नेके मभेदः भोक्तभोऽयानामप्यसंस्येयाः

प्रकाराः। खल सर्वेषां मोक्कृणां सर्वाणि मोऽयजातान्यनुकू्‌- खानि, अपितु भोक्तुणां जातिदेशकाखावस्थामेदेनोपकाराया- पकारायापि प्रतिनियतानि नद्येकस्यानुकूरं ग्रतिकूरं वा चस्तु तथेवस वषाम्‌ , एकस्याप्यनुद् म्रतिकं वा सर्वं सर्वदा, अपितु तत्राप्यवस्थादिविशेषेण उ्य्वरस्थितम्‌। इतश्च कस्य कदा किमनुद्धरं, किं वाऽस्य साधनं, किच्च प्रतिदरं, कथं तदुदयः, को चाऽस्य प्रश्शमनोपाय इति उपादेये तदुपायः, हेयं हेयहेतुः; हानसाधनमि्येतानि तदात्व एव विक्ञेयान्यभुचन्‌ सर्वास्व. षणासु प्राणैषणा प्राथभ्येनोदेतुमर्हति अतश्च प्राणिनां सष्टिरे- वायुरवेद्स्य बीजन्यासः

“अनुत्पायेव प्रजा आयुर्वेदमेवाम्रेऽखजत्‌, इति सश्रतोक्त-

स्तौरयेन 'आयुरवदमेवागरेऽखजन्ततो विश्वानि भूतानि" इति

काश्यपसंहितायां एर ६१ ) सृष्टितोऽप्यायर्वैदस्य उयेष्ठधं निरदिश्यमानमपि निभित्तनेमित्तिकयोः पौर्वापर्यानुक्रममनुस- नधाय (अग्निहोत्रं जहो ति, यवागूं पचतिः इत्यादौ पाटक्रमाद्‌ वद्धीयांसमार्थक्रममिव “तंव प्रसादस्य पुरस्त सम्पदः" इति प्रसादे सम्पद्‌: क्तेपिष्ठभावमिव वस्तुतः सृष्टया सहायुर्वेदस्य धनिष्ठ नेदिष्ठं सम्बन्धमारङ्कारिकोक्त्याऽभिन्यनक्ति। कि वा वारकस्थोत्पत्तेः पूवं स्तन्यो द्मनमिव सृष्टः म्रथमत आयु विज्ञानं स्वरसतोऽपि सम्भवति ! विकासवाददश्षा भौतिकसषटेः पूर्वमोषधिवनस्पस्यादीनां सृष्टः प्रतिपादनमपि भूतोद्धवात्‌ प्रागेव मेषज्यविह्धानस्य बीजन्यासं द्यति! भात्रेयाचार्येण तु शखोऽयमायुरवेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादिस्वात्‌ स्वभाव- संसिद्धरुष्षणसरवात्‌? ( च. सू. अ. ३० ) इत्यादिना आयुतेँदीया- ववोधोपदेशयोः सादिषेऽपि संसारस्येवायुरवेदवि्तान परम्पराया अप्यनादिस्वं निदिष्टमस्ति | आयुरवेदशन्दार्थप्रद्चनेऽस्यां कार्यपसंहितायामू-“लायु- जीवितु च्यते, विद्‌ क्तने धातुः, विद्लरूमे च; आयुरनेन क्षानेन विद्यते ज्ञायते विन्दते छभते !रष्यरतीष्यायुरवेटः' (प° ६१) इति दीर्धजीवितस्य क्तापकमुपायप्रतिपादनद्वारा प्राप कमविनाशकं शाखमायुवेद्‌ इति विधीयमानं

श्ायुधेद्‌ः

१. उदेति पूर्व छुखमं ततः फरं घनोदयः प्राक्‌ तदनन्तरं पयः निमित्तनैमित्तिकयोरयं क्रमस्तव प्रसादस्य पुरस्तु सम्पदः "+~ ( राघरुन्तङे अङ्कं)

उपोद्धातः | 2

निर्व॑चनमस्य स्वरूपं प्रयोजनं निदृशंयति एवं भु वंदशाघ्रादायुषः स्वरूपं, येस्तदुपेयते ते उपायाः, विद्यमान मायुर्थेविन्तायते तानि ठक्तणानि वेद्यन्ते, तानि विञाय यथोपदेशं प्रवृत्त आयुरवस्थापयति च, एतञ्ज्ञानमन्तरेणाय थावस्रवतेमान आयुर्विनाश्ञाय प्र॑मवतीति ससाधनायुरवस्था

पकलास्मायुरवेद शब्दार्थः ` तदिदं उयाधिपसिमिोत्तः स्वास्थ्यपरिरत्तणं चेति प्रयोजनद्रय-

मात्रेयसुश्रतोक्तिभ्यामपि समन्वेति जयुर्वेदशब्दोऽयं बह्शाखाविस्तीणं चिकित्साविन्ञानम- ववोधयन्न केवरं मानवीयं मेषज्यमभिग्रेति, छन्तु दस्व्यश्चग- वादीनां पश्यपर्तिणां, वृक्तकतादीनामुद्धिजानामपि भषञ्यानि गर्णाति पालकाप्य-मतङ्ग-श्षालिहोत्रादयो रहस्स्यश्वादि भेषञ्योपदेशाचार्यास्तदीयोपदेश्रूपास्तत्परम्परागताश्च मन्था एवं वृक्तायुवरे काश्यपसारस्वतपराशरयादय आचार्यास्तदुपदे शपरम्परागता विषया वराहस्तंहितायां भटोरपटीयतत्प्रकरण व्याख्यायाययुपवनविनोदादिषु बहुश्च उद्धिख्यन्ते धन्वन्त रिणाऽपि नराश्वगोगजन्रुक्तायुवदनां सुश्रतायोपदेश्नस्य जाग्नेयपुराणे ( अ. २७९-२९२ ) उज्ञेखोऽस्ति परं धन्वन्त- रिकिश्यपत्रेयादीनां मानवीयायुरेद्त्रिभागविषयं विशेषत ` उदिश्य म्रवतंनेन प्रकृतो पयोगेन चात्रापि तमेवा धिक्स्य प्रदश्यंते अस्याऽऽयक्तानसम्पदपतया वेदशब्देनोररेखः कियते तेर्थिकेः वेदो नामार्याणां सर्वादिमो ` ज्ञान विज्ञानराशिः। तत्रैव पूवषां क्षानानि विक्षानानि सम््तानि। आर्याणां तपःप्रणिघानारोकोऽञ्वरेषु हृदयेषु प्रातिभप्रकाद्रूपेण वर्त॑मा- नाऽभ्याहतस्वरूपाऽऽयक्तानसम्पद्रेदश्चब्देन व्यवादहियत ।* तेषु सानविक्ञानप्रस्थानेष्वेकतमदेतद्िक्ञानमपि ऋग्यजञःसामाथ्वनामभिविभक्तानां वेदानाभुपवेदसूपेण धयुवद-गान्धर्ववेद्‌-स्थापत्यवेदायुरवेदा उच्चिख्यन्ते उपशन्दो हि सश्चिङृष्टं सम्बन्धमभिप्रेति तत्र केन वेदेन वेदाय॒चेवयोः सहास्याऽध्यु्ेवस्य सम्बन्ध इतति विचारे “इह सम्बल्धः खल्वायुवंदमष्टाद्धुपाद्गमथववेदस्थः इति (सू. अ. १) सुश्चुताचा्यः कण्ठत पएुवायुर्ेदस्या- १. चरकसंदितार्या-“हितादितं खखं दुःखम्‌ इत्याद्विना आत्मनो भोगायतनस्य पञ्चभूतविकारात्मकस्य शसीरस्य, भोगसाध- नानां चक्षुरादीच्ियाणा, मनसोऽन्तःकरणस्य, ज्ञानप्रतिसन्धातुरात्म- नश्वेषामदृष्टविक्ेषनिष्पत्नः संयोग एवायुःपदाथैः; आयुषः स्वरूपं, तत्र हिताहिते, पथ्यापथ्ये, तकत्फरीमूते सुखदुःखे, आयुषस्तन्तदवस्थातु" ख्याणि रक्षणानि चेत्येभिः साधनफलादिभिः समन्वितमायुर्वैदयति जञापयततीत्यायर्वेद इति प्रवचनं निर्दिद्यते ( छत्रस्थाने अ. ३० ) २. सुश्रते-“ायुरस्मिन्विधतेऽनेन वाऽऽ्युरविन्दतीत्यायुर्व॑दः" देति करन दारीरेन्धियसचात्मसयोगरूपमायुरस्मिन्‌ प्रतिपाधतया विते, आयुरनेन विधते ज्ञायते विचायते वा, आयुरनेन चिन्दति प्रापमोतीत्यायुवेंद इति निवैचनं विधीयते ( ख. अ. १) रारिदोत्रः सुश्र॒ताय हयायरवेदस॒क्तवान्‌

पारुकाप्योऽङ्गराजाय गजायुवंदमव्वीत्‌ ( अश्चिपुराणे २९२ अध्याये )

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स्निपत्योपकारकाणि,

थ्चेवेदेन सहाङ्गङ्गिभावं निदिंशति ““चतुर्णाश्चकसामयज्ञुरथवं- वेदानामथर्वैवेदे भक्तिरादेश्या ( च. सू. अ. १० >) इद्युक्िख- जनात्रेया चार्योऽपि छग्वेदादिभिश्वतु्भिः सहास्य सम्बन्धमपरि-

हर्‌ भक्तिपदेन अथवेवेदेन संहेवास्य नेदिष्ठं सखभ्बन्धमवबो.

धयति अस्यां काश्यपसंहितायां तु ( प्र. ६१) “जयुेदं कथं चोरपन्नः१ इति प्रश्ने “अथ्ववेदोपनिषत्सु प्रागु्पक्चःः हव्युत्तरेण प्रथमतोऽथर्वमूखकसं निर्दिश्य, “कं वेदं श्रयति" दति प्रशनान्तरे “अथर्वैवेदमित्या, तन्न हि रक्ता-बरि-होम- रान्ति ` "धरतिकर्मविधानमुदिष्टे विशेषेण, तद्रदायुवदेः तस्मादथर्ववेदं श्रयति, सर्वान्‌ वेदानिव्येके इव्युपन्यस्य, ““आयुरवैदमेवाश्रयन्ते वेदाः... -तस्मादुव्रूमः ऋग्वेद्यजवंद्‌ सामवेदाथर्ववेदेभ्यः पञ्च मोऽयमायुरवेदः'” इष्युद्िखन्नाचार्यो विषयविरोषसच्िकर्वेणाथर्वसम्बन्धवादमादौ निर्दिश्य, सर्वेषु वेदेषु न्यूनाधिकभवेनेतद्धिषयोपलम्मेन स्ववेदसम्बन्धवादम प्येकीयमतव्वेनोल्खिख्य, बद्याश्वीन्द्रादिसम्प्रदायपरम्परया क्रम विकसषितस्यायुदेदीयविन्ञानस्य स्वतन्तरप्रस्थानान्तररूपेण विज॒म्भिततया चेद्‌ान्तरवत्‌ सर्वोपजीब्यतायाः पुरषनिः्रेयस- परतायाश्च दश्च॑नेन वित्तेयविषयश््ुलितभवेन प्रथगवस्थित- स्यायुर्वेदस्य स्वीये विषये प्राघान्येनोपादेयस्वमभिप्रेसय महा- भारतस्य पञ्चमवेदत्ववत्‌ पञ्चमवेदस्थानीयस्वमपि .रुवविचारा- रूढमन्ततः प्रकाङ्ञयति

“जायु दमशङ्मुपाङ्गमथरवेवेदस्य' इति सुश्रतोक्तावुपा ङ्पददर्शनेन साक्तास्सम्बद्धस्याङ्गतया, अङ्गसम्बन्धस्योपाङ्गत- याऽऽपाततोऽवगमाष्दाङ्गेष्वप्यङ्गत्वमायुवदस्य; अङ्गान्यनूपा ङ्गानि भवन्तीव्यनुसन्धाय वेदकारदुत्तरं शिक्तायज्गानां, ततोऽपि पश्चादुपाङ्गभूतस्यायुरवेदस्य कार इति सुश्रुतस्यार्वां ग्भावसाधने केषाञ्चिद्धिदुषां दष्टाबुन्मिषति परयुपङ्गशब्देना- पाततस्तथा प्रतीतावपि वेदाङ्गेषु रि्ताकत्पादिषु वेैद्यकविद्याया विरोषतः सम्बन्धस्यादरशनेन, प्रत्युत वक््यमाणदिश्ा श्रौतथ्- न्धेभ्यो ब्राह्मणेषु, ततोऽपि संहितासु यथापूवमायुवेदीयविषया णामतिश्ञयदक्तनेन, तत्राप्यथर्ववेदे बाहुर्यो परस्भेन वेदेनैव सहास्य नेदिषः सम्बन्धः प्रतीयते अङ्गत्वं नामाऽप्रधानत्वं दोषस्वमिवावयवत्वमपि तच्छुरीरान्तरयुप्रविश्योपकत णि छुरीराद्‌बहिभूयोपकत्‌ गि आराटुप- कारकाणीति दहिविधास्यङ्गानि मीमांसकेरविंभज्यन्ते, यान्यन्त- रङ्ग-वबदहिरङ्शषब्दाम्यामपि विम्य व्यवहर्तुं शक्यन्ते वेद्शरी राद्हिभंतानि शिक्लादीनि बहिरङ्गान्येव भवन्ति वचयमाण- रीत्याभेषञ्यायुष्यसंशमनीयकमादीनां बहूनामायुवेदविषया्णां वेदसंहिताभ्यन्तरेऽपि प्रोततया तच्छरीरमनुभ्रविष्ट आयुवेद्स्स्व-

| न्तरङ्गभावमेव भजति नानाविक्तानमहारय्िरूपे वेदे या्चिको

महान्‌ भ्रधानविषयः, जायुवेदीयविषयाद्यः प्रासङ्गिका आच- न्तरविषया द्यत आयुर्वेदीयं वित्ञानं वदिकविक्तानशरीरमनु- प्रविष्टं सत्तदवयवरूपमङ्ग मयति महावयवानामङ्गत्वं, स्वरवाव- यवानाुपाङ्गस्वमिति हिधा विभागं प्रद्श्यं बाह्वादीन्‌ करा्दीश्च

१. प्रणम 9 तएव कालोऽ 1, 2, ©, पभ,

४. उपोद्धातः

निदशंयता दल्लनाचा्ेणापि जायुदस्यान्तशङ्गस्वमेव समर्थितं भवति यिं बहिरङ्ानां शिक्ञादीनामप्यङ्गभावमुपादाय सुश्रतस्योपाङ्गस्वोज्ञेखः स्यात्तदा शिक्तादेरपि पश्चाद्ावौचिस्यवत आयुर्वेदस्य भूतदषटरपि प्राग्भावः सुश्रतेनेवोक्तः कथं व्याह न्येत शिक्तादिषु बहिर्धेष्वप्वन्यवहतेन वेदशब्देनायुरेदस्य निर्देशोऽपि पूर्व॑भावित्मेवास्य प्रगुणयति विक्तानमहोदधेवे- दस्येकतरङ्गरूपेण वर्तमानमिदमायुरवेदीयविन्ञानं वेदशषरीरमनु- प्रविष्टमनुसन्धाय केचन उपवेदक्षब्देन, अवयवावयविभावा- पक्ञमनुसन्धाय केचन वेदा्गश्षब्देन, स्वेरपावयवात्मकमनुसन्धा- केचन वेदोपाङ्गश्च्देन, व्यवहरन्तो मिथोऽव्याहतं खमन्वयं. गमयन्ति किं बहूना, कश्यपाचार्यण तु उपशतदमप्यनुपादाय पश्चमवेदष्वेन निदिषटमस्ति ! अन्तरवयवाश्च अवयविना सहै. वावतिष्टन्ते, नावयविसमयादुत्तरः समयोऽवयवानाम्‌। वदै. वञुपवेदशब्दस्षामानाधिकरण्येन चतंमानोऽयञुपद्गशब्दोऽपि- भायुरवेदसुपर्येवारोहयति, नतरामर्बाग्भाव्ङ्कोद्याय कटपते

हहेदमनुसन्धीयते--बाह्यणोपनिषन्महामारतपुराणस्टृव्या

दिषु बेदचतुष्टयोज्ञेखो परम्भेऽपि अथंवधेदे ऋर्यजःसामाथरव. वेदानामु्रेखेन, त्रिषु वेदैष्वथर्ववेदस्थौनुलरेलेन त्रेयीवि- भागः प्राथमिक इति विवेचकानां भणितिः तन्न मन्त्रा्मके बेदे पया्षिका ऋष्‌, गद्याप्म यजः, रीव्यात्मकं सामेति त्रिधा विभागः) अस्मिदधयीविभागेऽथरवंमन्त्राणामपि यथा- स्वमन्त्ाबः भारहदुभूमिकास्वादिमक्ञानसम्पत्‌ त्रयीरूपेण थदेब प्रादुबेभूव, तदाऽप्यायुषंदविक्ञानमासीदेवेति ऋग्यजुः सामसु त्रिष्वपि तन्न त्रोपरभ्यमानेस्तद्विषयेरवगम्यते। अथर्ववेदस्य प्रमेयवेशिष्टयेन प्रथमणनायामनेन सह चत्वारे बेदाः ब्राह्मणोपनिषस्सु स्मृतिमीमांसादिष्वपि वेदानां चातु- विध्योररेढश्चतुवंदविदां निदंशश्चोपरुभ्यते तेन कग्यज्ञुः- सामाथववेदानां चतुर्णां पुराकारुदेव समकनत्ततया प्रामाण्य. मित्येतस्मिन्विषये न्यायमन्नर्यां बेदसवंस्वे बहू प्रपञ्चित मस्ति! अथर्ववेदेन सह चतुर्णा वेदानाुपवेदान्‌ प्रदशेयता चरणव्यूह्रता “छऋग्बेदस्यायुवेंद उपवेद ह्याह भगवान्‌ श्यासः स्कन्दो वा, इति व्यासस्कन्दमतरूपेण ऋषवेदोपवेदख- मायुरवेदस्यो्ञिखितं दश्यते तदुक्त्या त्रिष्वपि वेदप्रस्थागेष्वे. तद्विषयरामेऽपि, ऋग्वेदे स्ववेधयोरधिनोः सु्ेष्वन्यन्नापि तादाविकैरतीतेश्च पुराष्रत्तः सह बहुश्च घायुर्ैदीयविक्ञानविष-

१. यस्माद्चोऽपातक्षन्यज्ञयंस्माद पाकषन्‌ सामानि यस्य छोमान्यथवोङ्गिरसो सुखम्‌) (अथवं १०।७]२० २. तस्माचज्ञात्सव॑हुत ऋचः सामानि जङ्िरे छट्दांसि जज्ञिरे तस्मा्जुस्तस्मादजायत ऋक्‌ १०७८; यज्ञुः ३१।७; अथव १७।६।१३ २.सावा एषा वाम्‌ त्रेधा विहिता-ऋचौ यजूषि प्ामानि। | ` ( रातपथ १०।५।१७ ) ४, तज्ञोरः पुस्तकाल्यगतायामुमामहेशसंवाद रूधायामन्यस्यां कादयपसंहितायामपि--“ऋग्वेदस्योपवेदाङ्नं कारयपं रचितं पुरा रक्षमन्थ महातेजः अभमैयं मम दीयताम्‌ इति ऋग्वेदस्योपवे- ` ` दस्वेनोहेखोऽस्ति ".

तिकि नतु कनि ५.५.

याणाञ्युपरम्भेन विक्ेषत ऋग्वेदेन सहास्य सम्बन्थमभिपरेत्य त्रयीदशा किल भ्यासर्कन्दादिभिः केश्चन पूर्वाचर्येस्तथाऽभ्यु- पगतं सम्भाव्यते यदा कम॑करापस्यापि विकासविभागवि- रोषेण श्ान्तिकपौष्टिकाधेहिकश्रेयःकर्माणि देहिकागन्तुकसंशा. मनकमांणि चोपादाय तस्रधानस्याथर्ववेदस्य प्रथश्गणनया वेदिकं विज्ञानं चतुर्धां व्यभञ्यत,¶तदाऽऽधर्वणे विज्ञाने सैषञय- कमांण्यायुष्यकर्माणि भूतादिपरिहारक्मांणि बहूुक्षः परथग्भावे- नादृश्यन्त ।-कोौ शिकसू्ङ्ताऽपि तथेव तश्र तन्न विनियोगः प्रदर्ितः। तदेवमाथर्वणप्रक्छिवायां विशेषरूपमवा पस्य शान्ति. कपौिकादिश्चबरितस्य भैषभ्यवित्चानस्य क्रमशो विकसनेन सराकमायुरवेदीयविषयस्यापि विकसनाद्रचयमाणदिन्ञा वेदान्त रेभ्योऽथवेवेदे एतदीयविषयबाहूलयदश्चंनाच्च तादार्विकीं सिथति- सुषादाय अथर्वणा सहास्य नेदिष्ठं सम्बन्धमनुपश्यद्धिः पा चयिर्धन्वन्त्यात्रेयकश्यपादिभिः पूं निदिष्टरेखेरथर्वोपाङ्गस्वम- य्ववेदे विरेषभकप्यादेशनमथर्वमूरकस्व चोक्तं युक्तिसङ्गतमव- गभ्यते आष॑परम्परायामानुश्रविकरूपेणानुवर्तमानस्य पूवैरपि क्तुर- स्मरणेन, भ्यो बह्याणं विदधाति पव॑ यो वै वेदे श्रायुवेदीया वेव प्रहिणोति तस्मै' इत्यादिना पूव॑सि- विषया --, दस्येवेश्वरत्तानाव्मकस्यास्य जगर्छष्टम नसि प्रतिभानोर्खेखेन, ऋषीणामपि केवरं न्तरद्ष्टतया निस्यं पद्पदा्थंसम्बन्धमवलम्बमानस्यास्य ज- नादिनित्यष्वमिति षेदाथंमीमांसकानां पूवांचार्याणां सिद्धान्तः) वेदेऽपि तस्माच्‌ परमेश्वरात्‌ ऋचः सामानि जज्ञिरे यजश्राजा यतेत्युरखेखोपरूगमेन शब्दस्य पर्युच्चारणं नवोस्प्या तत्समु- दायास्मकस्य वेदस्य नित्यत्वमपितु सगोदावीश्वरेण विरच्यो- पदेश्चनात्‌ पौरूषेयत्वमेव, तथाऽपि सकलदो षाशङ्काविनिञुंक्तस्य परमाक्चस्य परमाष्मनः डृतिरूपतया सर्वाङितोऽबाधितं प्रामा- ण्यमिति ता्किंकादीनं सिद्धान्तः। अनादिरपौरूषेयः पौरूषेय आर्षो वा भवतु वेदः, कशास्य प्रकाषस्योद्मस्य वा ताचिकः समुचितश्च समय इतीदानीं प्रसक्तानुप्रसत्छो विचार भास्तां तावत्‌! सर्वथाऽपि पूर्ब॑तमेरपि सर्वाति्षायिनि प्रमाणपदे अरतिष्ठापितोऽयमपरिच्छिघाद्होः कारादायांणां रिरःसु समानि. तोऽस्तीव्यन्र कस्यापि शिप्रतिपत्तिः। अधत्वेऽपि प्रान्यः वाश्चात्याश्च विपरित एनं प्रायः संमानद्शेव पश्यन्ति केवलं पुरातप्वामुसन्धानधडा वैदिकं साहिव्यं पर्यारोच्चयतां विवेचकानां विचारविरोषाणां निरीकणेऽपि केषाशिद्रादश्षसह- खवर्षपूर्वस्ववादः, केषाश्चिच्वतुःसहसरवर्षप्रागभाववादश्चेवमा- द्यो बहवः पक्ताः स्वस्वविचारारूढा दश्यन्ते। यथातथाऽपि रोके यावन्ति प्राचीनसाहित्यानितिषु सर्वप्रथमं वैदिकसाहित्य- मित्यत्र केषामपि विमतिः तेनास्य वैदिकविन्ञानैस्य, एत- द्र्भगतस्यायुवेदीयविक्ञानस्यापि समय उपर्यवारोहति। तस्मिन्‌ वैदिके विक्ञानभ्युहे विक्ञानान्तराणीवायुवेदीयं विज्ञानमपि बहुश ओतं प्रोतं दश्यते तथाहि-

, . ,, गरज तरा ञ्जाथर्वणानि ( ताण्डयमहानराह्यणे १२. ९. १० )

उपोद्धातः

ऋग्वेदसंहिताया--जराजीणं स्य स्यवनस्य वन्दनस्य छषेरधिभ्यां रसायनेन पुनर्थोवनापादनं (१. ११६. १०। १. ११७. १३} १, ११९. ७. ); दासैरग्नौ जखेऽपि प्रेषणे रत्ितस्य दीर्घतमसः पुनदासेन वितष्टश्चिरोवक्तसोप्यश्धिभ्यां जीवनेन दशयुगपर्यन्तं जरां परिहायं रक्षणं ( १. १९८. ४-६ ); रणे शयुभिरिलन्नपदायाः खेखनूपपल्न्या विश्पखानाम्न्या अधिः भ्यामायस्रजङ्घायोजनं ( १. ११६. ५५ ); विरिरशाङ्गस्यान्या- दैरवयवसङ्कटनं ( १, ११७. १९); शशन्रुभिचिश्चकलीक्रृतस्य श्यावाश्वस्याङ्गशकखानि संयोर्य प्रवयुञ्जीवनं ( १. ११७.२७४ ); किमन्यत्‌ , दधीचस्य शिरः पथक्छ्रत्य संरदयाश्चशिरः संयोज्य तस्मादश्िभ्यां मघुविधाया म्रहणे तस्याश्चशिरश्खे2े पुनस्ताभ्यां ूर्वशिरसः संयोजनम्‌ ( 9. ११६. १२। +. ११७. २२

जन्धाय ऋञ्ाश्चाय द्टिदानसम्‌ ( १, ११६. १६। १. ९१७. १७); `

अन्धाय कण्वाय चक्ुर्दानं, बधिराय नार्ष॑दाय श्नोत्रदानं ( 4. ११७. ); पङ्वे परा्रूजाय विगुणजानवे श्रोणषंये गतिदानम्‌ ( १. ११२. ) वधिमस्या नपुंसकभतृकाया अपि ुत्रोश्पाद्नं (१. ११६. १३); चिश्वकाय विनषटपुतरदशेनं ( १, ११६. २३); ऊुष्ठरोगेण भरतारमप्राप्य पिवृगरहे जीयंन्त्याः कन्तो वतीपुञ्या घोषायाः कुष्टं निवाय भवृदानं ( १. ११७. ७); कुषेन श्यामवर्णाय श्यावाय रोगं निवाय सुन्द्रख्चीद।पनम्‌ ) ( १. ११७. ) इष्यादीन्यश्िनोरदूयुतान्यवद्‌ानानि, देवभि- षरभ्यासधिभ्यां वायुदुए्थिन्यादिभिरिवानुदलमेषजस्य प्रदा- नस्य प्रार्थना ( 9. ८९. ); अश्चिभ्यामोषधिवनस्पत्यादीनां प्रक्चेणाभिव्यल्ननं (१. ११६.८ ); युवां भेषव्येन भिषजौ

स्थ हइत्यधिनोः प्रार्थनम्‌ ( १. १५८. ); अक्तिद्शंनसर्वेन्वि-

यसामर्थ्यजरानिवृत्तिश्ञतवर्षायुः प्राप्तयर्थमधिनोः प्राभ्रनं ( १.११६. २५ ); आच॑स्कस्य संयुषेश्च निष्त्तप्रसवाया अपि गोरधिभ्यां प्रसवस्य पयोबाहूुङ्यस्य सम्पादनम्‌ ( १. ११६. ३२. १. ११७. २० )\ इन्दरेणापि अन्धाय परावजाय दशेदानं, पङ्कवे श्रोणाय गतेदनम्‌ ( २. १५. ७») इन्देण अपारायाश्चमं- रोगस्य, तितु: खल्वाटस्य निवारणम्‌ (८.९१. ७); इन्द्रस्यौषधिधारकत्वं ( २. २६.७ ); नानाविषकृमिवणेनं तघ््- तीकारश्च ( १. १९१. १-१६ ); नानायषमरोगनिरसनं ( 4०. १६३. १-६ ); सौरप्रतीकारेण हृद्रोगादीनां निरसनं ( १.५०. ११-१३ ); जरस्य भेषजसवम्‌ ( १०. १३७. 4. २३. १९); जोषधीनां वणनम्‌ ( १०. ९७. १-२३ ); यचमान्ञातयचमराज- यचमग्राहिप्ष्टयामयसिपसिमिहृद्धोगप्रष्टतीनां रोगाणायुर्रेखः

( १०, ९७. १०५. १३७. १६१. १६७ ) इव्याद्यो बरवो विष- |

यस्तन्न तत्रोपरुभ्यन्ते |

शुङ्खयज्ञुःसहितायामपि | दवादशाध्यात्रे सूक्त्वये ( १२. ७५-८९. १२ ९०-१०१ ) जषघीनामगवुङ्करस्वं;

यचमनाश्कस्वं, यस्तासां खनको यदथं खननमुभ्वेषामुप-

कारकं, बरासार्चःश्वयधुगण्डश्छी पद्यदमसुखपाकत्ततादिना- क्कस्वं; तन्र तत्र (१९.८१-९३ २०.५-९। २५.१-९ ३१.१०

१३३०1 ८-१०) अश्वस्य मनुष्यस्य शारी राङ्गोल्रेखः, यचमा-

# ` + +र)

पणी नीती की की मी मी जी मी भभ

मीवाबलासोपचितपाकारण्शो विषूचिकाह्द्रोगार्म चर्मरोगकुष्टाङ्- भेदादीनां रोगाणासुद्रेखश्चोपरभ्यते तेत्तिरीयसंहितायां काम्येष्टिमकरणे दिपक चमोन्म- दपरिहारस्य प्रार्थना, यच्मराजयचमजयन्यसेगोत्पत्तर्विषथो (३. १.१ १.।२. ४. १४. >) दश्यते | सामसंहितायां खक्मरविष्टानां मन्त्राणां प्रवेशेनायुर्े-

द्विषयावबोधकानां मन्त्राणाञ्ुपरुम्मेन साग्नोऽप्यस्मिन्‌

विषये ऋगौकमस्यमवगम्यते

अथवंसंहितायां त॒विशेषेणैतदीया बहुविधा विषया , दश्यन्ते। तन्नोपशतं सूक्तानि मन्तराश्चैतद्विषये रभ्यन्ते। ऋगादिषु प्राय एेतिहासिकेन रूपेण कचन प्रसङ्गेनाप्यायरवेदविषयाः समा. गच्छन्ति; अथवंणि तु अन्तराऽन्तरा रोगाः, शारीरकावयवाः, रोगप्रतीकारविदोषाः, तत्तदोषधीनां तेषु तेषु रोगेषूपयोगिता चेवमाद्यो बहवो विषयाः रोता दृश्यन्ते; येनायुर्ेदस्याथव- सम्बन्धः संफुरीभवति तत्र -

रोगविषये--तक्म ( ज्वर ) रोगस्य वर्णनं (६.२१. १-२ ); तद्धेदानां सततश्लारद-मरष्म-शीत-वार्षिक.तृतीयकादीनां निदेशः (१. २६. ५. २२. १-१४); तक्मविभेदास्तन्र मण्डः कोपयोगः ( ७. १२२. १.२); तदावे जाङ्गलप्रदेशतया कि सुञवद्ाहीकगान्धाराङ्गमगधादिषु तक्मप्रत्ेपनि्ेशः . (ण. २२. १४ ); बरासस्यास्थिपरहृद्यपीडकःत्वं ( ६. १४. १-३ % मन्यागण्डमारायाः ५५ बिमेदस्वं, मेभ्यगण्डमारायाः ७० प्रमे. दस्वे, रकन्ध्यगण्डमारायाः ९९ प्रभेदष्वं ( ६. रण. ¶१-३ %; अपचितः ('गण्डमारायाः ) एनी-श्येनी-करष्णा-रोहिण्य-सूति- केति मेदनिदर्शनं 8. ८२. १-२ ) शीष॑ि-रीर्षामय-कणं. शूल-विरोहित-विषर्पकाञङगमेदाऽङ्गउवर-विश्वाङ्गय-विश्वक्षा - रदतक्म-बरास-हर्मि-यचमोधः-काहावाह-क्छोमोद्रनाभि-

"हृद्यगतयच्म-पार्धपृ्ठिवं्तणान्त्रमञ्जगतपीडा-विद्रध- वाती -

कारा-ऽकूजी-पादजानुभ्रो णिपरिमंसोनूकोग्णिहारीषवेदनादि -

नानारोगाणां वर्णनं ३. १३. १-२२ दश्यते द्रारीरकविष्ये--शरीरनाडीधमनीनिदेश्चः, द्िरा्णां

शातरवस्य धमनीनां सहखष्वस्योर्रेखश्च ( ¶. १७. १. ४। ७.

३६.२ ); नानारोगैः सह क्षारीरावयववर्णनं ( २. ३३. १-७ ` नानाक्षरीरावयवोर्रेखः (२. ३२. २।४. १२. ४। १०.२. ¦ $ १०. ९. १३-२५ >); केश्चास्थिक्लावमांसमञ्जापर्वोर्पादाष्टी- ` वच्छिरोहस्तमुखप्र्ठिवर्जद्यपार््जिद्धाम्रीवाकीकसस्वगादीनाघ्चु *

लरेखश्च ( ११. १०. ११-१५ ) श्यते ि प्रतीकारविषये--मूत्रावाते शरशखादिभिमुत्रनिः- सारणं मेदनं वा (१. २. १-९); सुखप्रसवस्तद्धिक्रियायां योनि- `

| मेदनादि ( १. 98. १-६ ); जरुधावनेन बरणोपचारः (५.५७.

१-३ ); अपचितां पिडकानां शराकावेधनम्‌ ( ७.७८. १-र ); अपचिति रछवणोपचारः ( ७. ८०. १~-२ ) एकमाद्याः क्च ~ प्रक्रियाः; बहिरदेश्ाच्हुरीरान्तरनुप्रविश्यं रोगकारकाणां नन विधङ्मीणपं तज्निरसनस्य वणनं 89. १५.) = सिकादन्तादिषु प्रविश्य रोगकारकाणां येवासकष्कषेनरकक्गिपि"

हि

-६

उपोढातः

विल्कासीनां मीणां नाक्ञनं (५. २६. १-१३ ); छृमिवर्णने, मनुष्यगताना रावादिगतानां मीणा सौरङिरः गनिंवारणं ( २.२२. ५-६ ); हानिकारङाणां रोगजन्तूनां सौरः किरण नाशनं ( ४. ३७ १-१२); सौररक्तकिरणेहंदोगकामल- पाण्डवादिरोगनाश्ञनं ( १. २२. १-४ ); प्रातरातपस्वेदनप्रभा- सानजलखानानां शारीररोगनाक्ञकव्वं ( ३. ७. +-७ ); हृदय रोगे हेमवश्नदीजकोपचारः ( ६. रध, १-३ ); जलस्य सर्वरोगौ. वध्वं ( ६. ९२ ); वानस्प्यपर्व॑तीयवायोरारोग्यसाधनघ्वं

%( १, ९२. १-४ ), वायोरभैषत्वम्‌ ( ४. १३ २-२ ); आरोग्यव पनं ( २. १०. १-८ ); छेव्यनाशनोपायदशनं (६. १३८.१ ~); यैवमादयो विषया रुभ्यन्ते प्रोषधविषये--नक्तधमाच्कप्णाऽसिक्तीनदसंजव्नेषधीनां

किङासपरितादिनाश्षकस्वं (१. २३. १-४); सुपणांऽऽसुरीसरू पाश्यामांचौषधीनां खमभ्नोगनिवारकवं ( १.२४. १-४ ); वल्मी करभ्यौषधघधविरोषस्य अतीस्तारातिमूत्रनाडी्रणादिनाशकष्वं (२. ३. 9६); पृष्णिपण्यां गभनाशरच्छविकारमरतीकारसरीरवर- दविकारकत्वं (२. २५. १-४); हरिणश्वङ्गस्य त्चमणश्च कयदुष्ठा पस्मारादिनादाकत्वं (३. ७. १-३); शतवीर्याया दूर्वाया दीर्घायुभ्यनानारोगनिहंणकारकत्वं ( इ. ३८ ) वृषाय. ष्मा्यौषधीनां ब्ष्यस्वं ( ४. ४. १-८ ); रोहिण्योषधेर्भससन्धा- नक्ञतपरतीकारकतवेन वर्णनं ( ४. १२. १-७ ); सहदेवया अपा- मार्गस्य तृषान्ञघेन्दियादिगतनानारोगङ्कव्याशन्वादिनाशक- घेन महिमवर्णनम्‌ (४. १७. १-८। ४. १८ ९-८ ४. १९. १-८); जपामागेस्य पापनिवतंकस्वं मुखदन्तशोधकत्वे (७.६७. १-३); सिराच्योषधे्महिमगानं (५. ५, १-०); कुष्टोष- सेस्वक्मयचमङष्टादिनाशकस्वं (५. ४. १-१० ); ऊष्टौषधेर्वणंनं ( ६. ६५. १-३ ), कुष्टधूपस्य तवमनाश्चकस्वं, कष्टस्य विश्वमेषः जत्वयातुधानतक्मनाश्षकव्वादिमदहिमा ( १९. ३९. १-१०);

आाक्षरीकविद्यरीकप्रठिकाविश्वशारदतक्मसु जङ्गिडौषधोपयोगः बृहदरप्यके --अश्वङ्गानां (१. ९. १.) मदुष्याङ्गानां (२.

(५. २२. ५-२४ ); जङ्गिडौषधेबंणने, तन्मणगिवन्धनं, तस्य करस्यानाश्चकत्वमायुष्करस्वं, विष्कन्ध (वातरोग ) नाञ्च स्वम्‌,जाशरीकविश्षरीकवरासष्ष्टयामयविश्वशारदतकमनाश्चकव्वं (२.४. १-६।१९. ३४ १-३०); जङ्गिडस्य विष्कन्धहरत्वं, विश्च. सेषजस्वं, यचमहरप्वंवातरोगनाशकस्व, धिन्नददुपामादिष्वग्दो- षदुनांमरोगनाशकस्वे (५९ ३५. 9-५); विषाणोषधे रक्तछरवे वातरोगे हितकारकत्वं ( ६. ८४. १-३ ); वरणौषधेंदमनाः हाकत्वं ( ६. ८५. १-३ ); पिप्पल्याः चिष्तातिविद्धवातीक्ुतरोग' मेषजस्वं ( ६. १०९. १-२ ); वलासविद्रधरोहितकविसह्पकरो. गेषु -चीपदुनामकौषधेरुपयोगः ( ६. ३२७. १-६); दैवीतितः छ्योषधेः केशचवर्धनोपायस्य वर्णनं ( ६. १२६ ५-३। ६. १३७. -१-३ ); गुणुटधपूपस्य गन्धेन यचमनाश्चः ( १९. २६. १-३ ); जलवायुद्धाय प्रसर्पिणां रोगाणां नाशचकसेन अजशङ्गयाः, अद्वारा प्रसर्पिंणां रोगाणां नाशकष्वेन गुग्गुहुपौलानल द्ची्तगन्धिप्रमन्दिनीनां, प्रस्ारिरोगनाश्कस्वेन अश्वत्थन्यप्रोध- ` शिखण्ड्वायोषधीनां वणनम्‌ ( ४. ३७. ५-१२ ); ोषधीनां |

महिमगानम्‌ ( ६. २१. १-२ ) असिक्री्ष्णाए्ष्णि्रस्वेणती- ,

+,

५.

स्तभ्विन्येकशुङ्गप्रतन्वस्यंश्मतीकण्डिनी विशाखावेशवदेभ्युग्राऽ- वकोर्वातीष्दणशचङ्कया विरूपेण नानौषधघीनां प्रकाराणां वर्णै; नानावीर्दरसनिर्मितगुटिकाव्सकवेयाघ्रमणेर्वणनम्‌, जरवत्थदरम- सोमननीहियवानां, पुप्पवतीप्रसुमतीफटिन्यफर प्रकाराणां विष-

दूषणीकरत्यानाशनवरसनासनादिगुणानामोषधीनां वर्णनं

(८. ७. १-२८ ); दर्भभङ्ग (श्ण) यवसहसोमवर्ण॑नं (११. १५); ब्राह्यणनामकोषधेर्विषहरत्यम्‌, भयस्कम्भौषधेर्वि- पदिश्धराखनणादिहितकरव्वेपणांधिशङगकुडमलानां ज्नखप्राण्यो. घथिविषहरस्वं (४. &. १-८); चरणाप्रक्रयाय्योषधीनां विषहरस्वं (४. ७. १-७ ); नानाजातीयसर्पादीनुक्खिख्य तानुववास्तुवायो- षधीनां विषहरस्ववर्णनं ९- १३. १-११ ); मधघुपरुष्णीक्लीपा. रानां सर्पविषनाश्चकच्वं ( ६.१२ १-२ ); ग्याख्याभेदैन वस्मी.- कश्चदः धिरच्योषधेवां विषनाश्कत्वं ( ६. १००. १-२३ ); मधु कौषधेर्नानाविधसर्पङृमिविषनिवतंकत्वं ( ७. ५६. १-८); विषे- णैव विषप्रतीकारः (७. ८८. १); विषदोहनविध्या विषप्रती- कारः ( ८. ५. १-१६ } ८, ६. १-४ ); पर्क्रागमे रेन्दशान्तौ द॒र्भसणिचन्धनं ( १९. २८. १-१०। १०. २९. १-९ ! १९. ३०.

१-५ >); पुष्टिकामस्यौदुस्वरमणिबन्धनं ( १९. ३१. १-१४ );

स्युभयनिवरत्तये दभ॑मणिबन्धनं ( १९. ३२. १-२। १९. ३२. १-९ >) चेत्यादयः शतश ओषधीनां निर्देशाः प्रमदाः भ्रथोगा उपयोगाश्च तन्न तन्नोपरभ्यन्ते व्राह्यणय्स्थेष्वपि-एेतरेये-षफएचन शरीरोपपत्तेः प्राणस्य- चोज्ञेखः, अशिवनो्दववेयघ्वनिरदेशः, जानेन्द्ियवर्णनम्‌ (५. २२), ओषधीनां रोगनिवारकव्वम्‌ ( २. ४० ); अञ्जनेन नेत्रामयनि. वृत्तिः ( १.२ ); . शापादप्युन्माद्ङ्ष्टादीनामुद्धवः, शुमःरोपा. ख्याने वर्णकोपेन जखोदररोगः, दछन्दोग्ये--हदयनादीवर्ण-

नम्‌ (८. १.६); जआहारपाकप्रकरिया (९.९ ), निद स्वमप्नोर्टेखः (४.३. ), पामारोगवणंनम्‌ ( ४. १. ), रोगं निरस्य षघोड-

राधिकशतवर्षयुष्यकारकस्योपायस्योर्रेखः (३. १६);

४. ११) हृद्यतन्नाडीनां वणनं (२. १. ५९।४. २. ३।४, २.२०), मयुष्यव्ृक्तयोस्तुरुना (३. ९. २८ ), नेत्ररचना (२.२. >, मध्युरखेखः (३. २. ११); शापाद्रोगोत्पत्तिः (३.७. १।३, ( ९. २६ ); सामविधानव्राह्मणे-सपैभ्यो रणं ( २. ३. ३. )› भूताक्छान्तिः (२. २.२.) रोगाक्रान्तिः (२. ३.३.१; तैत्तसीयारण्यकेो-कृमिवर्णनम्‌ (४. ३६, १); प्नोच्रन्येषु- द्राश्वलायनीये--यत्तीयपञ्यषु ऋरिवि्चु परिहरणीयानां

रोगाणां निदेशः; श्रापस्तम्बीये-ङकमिवणनम्‌ (१५, १९.५); शृद्यभ्रयेषु-आदवलायनीये--पूयोदयास्तसमययोः शय-

नस्य रोगहेतुर्वं (२. ७. १.२), यजभाने परिहरणीयश्य रोग. स्योज्ञेखः (१. २६. २०); पशुरोगनिवर्तंनम्‌ (४. ८. ४०). द्ाह्कयायनीये--श्षएरीरपीडासमये वेदमन्त्रगाननिषेधः (४, ७. ३६ ), आग्रहायणयज्ञे भोञ्यवस्तुषु भूतनिवर्तनं ( ३. ८), सर्वरोगनिवर्दनं ( ५. ६. १-२ ); गोभिलीये--रोगनिव- तंकमन्त्रोहरेखः. (४.९. ), सपदंशोपायः (४. ९. १६);

' उपोद्धातः

+ ^ + ^+ ^+ +

श्रापस्तम्बीये--हणखियाः एद्यपत्रादिभिरभिमन्व्रणं (२

९. १०), अधंरिरः पीडायाः करमिहेतुकसवनिदेंशः, बारुके अप स्माररोगस्य हेतुतया ऊुक्कुरभूतस्योर्लेखः (७. १८. 9 ), बारे रेत्रियरोगपरिहारः (६. १५. ४); पारस्करेये- शिरपीडाया मदनेन प्रतीकारः (३-६); हिरण्यकेलोये- अग्ने रोगनाश्चकत्वं ( १. २. २८), बारुकस्य चेश्रियरोगनिवर्त॑नं (२.३. १०); खादिरे-ङृमिव्णनं (४.४. ३)

गोरोगनिच्रत्तये होमधूमप्रदेशे चारणं (४.३. १३), सर्पं शोपायः ( ४. ४-१ ) इतीदश्चा आयुेंदसम्बन्धिनो विषयास्तन्र तत्र न्यूनाधिकरूपेणोपरभ्यन्ते |

वेदिके साषिष्ये जायुरवेदीयविषयानुपादाय ब्लूफीरड

(14. 210000€्‌त ), हिखब्राण्ड ( 4, प्ा1160190त ), कैरेण्ड

( 29191 ), ड. पी काडीयर्‌ (२. ०6167 ), जाङी (. |

118 ), बोलिडः ( ©. "0. 20111 ) प्षीमरं ( 2170102 ) प्रभ तिभिः पाश्चाव्येविपश्चिद्धिः भारतीयेरपि केश्चन विद्धद्धिबंहुशो

निरूपितमस्ति सव्िषु विमरशंस्योपयोगिष्वेऽपि प्रासङ्ञिकवि-

स्तरभयेनेह विरम्यते

कौशिकसूत्रकृता तत्तन्मन्त्राणां विनियोगस्य प्रदर्शने तन्म- नत्रमहिमानमादक्ञयता चतुर्थाध्याये (अथ भेषञ्यानिः दस्युष- कम्य तत्तद्रोगप्रतीकारोपवर्णने तत्तन्मन्तेरमिमन्भ्य जलौषधा दिषानहवनमार्जनादयोऽपि बहश उपाया उपवर्णिता दृश्यन्ते मन्त्रसंहितामादाय प्रधृत्तेऽस्मिन्मान्त्रिकविधानान्यप्यनुस्यूतानि भवन्तु नाम, परं-तक्मरेगे वातिके मांसमेदःपानं, श्रेप्मिके मधुपानं, वातपित्तजे तेरूपानं, धनुर्वाताङ्कम्पक्षरीरभङ्गादिवा- तरोगेषु ध्रतस्य नस्यदानं, रधिरवहने खीरजसोऽतिप्रवतेने शुष्कपङ्कमृत्तिकापानं, हृद्रोगे कामरे भ्याधितस्य हरिद्रौदन भोजनं, श्वेतकुष्े यावज्ञोहितं कुष्ठं गोमयेन प्रधृष्य भ्ृङ्गराजष्टरि- नदर वारुणी नीरिकापुष्पाणि पिदा रेपनं, वातत विकारे पिप्पल-

प्राशनं, शसखावधाते रूधिरप्रवहिः ग्याधिस्थरे कथितलान्ञोदक-

सेचनं, राजयच्मङ्कुष्टरिरोरोगसवं गात्रवेदनासु नवनीतमिश्रङ्क पिष्टेन म्याधितशशरीरर्ेपनं, शखाभिघाते छथितदुग्धटाक्तापानं

सैन्धवरुवणचुणंप्रकिरणं, बणे गोमूत्रेण बणमर्दनं, मूत्रपुरीषप्र तिरोधे सेदनीयहरी तक्यादिद्रभ्यबन्धनम्‌, आखुकिरिपूतीकम यितजरसपरमन्दसाव्रस्कानां जरेनारोड्व पानम्‌, ` अश्वाद्यारोहणं, बाणमोक्तणं, ` गोदोहन्यां जरे एकविंशतियवाज्निधाय स्ने उध्व॑मुखे तज्ञलप्रवेशनं, खोहक्चखाकायाः प्रवेशनं, यवगोधूमव- ज्वीपश्यमूरपाविकाक्राथरूपस्य जरूविसोरफाण्टस्य पानसित्या दीनि मेषजान्यपि ्रतीकारोपायतया निदिष्टानि सन्ति। मन्त्र प्रति छठापनीयेऽपि श्चन््युदके शमी-शम-कार-व्ा-शाम्य- वाका-तकाश्चा-पटाश्च-वाशशा--शिदापा-किम्बल-सिपुन- दर्भा

पामार्ग-कृति-लो ्ट-वल्मी क--वपा-दुर्वाप्रान्त~बीहि-यवाद्यः

शान्तौषधयो निरे विधीयमानास्तहुदकस्य ` भेषभ्यदश्ञाऽपि बहुबाधापहारि्वं ज्ञापयन्तीति मान्तिक्यां क्रियायामिव भेष जवरिद्यायामपि सुत्रङ्ृतस्तदुपात्ताथवंसंहितायां अप्यान्तरः सम न्वयो विक्तायते॥ - ` ` ~

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प्राचीनकारे शारीरधातुवेषभ्याद्य इव रसोभूतप्रेतपिशा- चग्रहक्कन्दादीनां सुदरादिदेवानां कोपवेश्ादयोऽपि ` रोगकारण-

तया मता आसन्‌ , येन वेदिकमन्त्ररिङ्गादपि “रङोहामीब. चातनः? इत्यादिरूपेण रोगनिरसनाय तन्निदानभूतानां रक्तः

प्र्ठतीनामपाकरणमप्युपायतया निर्दिषटयुपलम्यते पश्चात्तन-

वे्यकग्रन्येष्वप्युन्मादापस्मारादिषु भूताचवेकश्चादीनामपि निदा-

नत्वेनोल्खेख उपरम्यते वैदिकाचस्थायामप्येतच्छेविंरेषेणः

कोशिकसुत्रादिष्वाथरव॑णमन्त्रविशेषाणां तत्र तत्र रोगे तन्निदा नभूतरकः्र्स्यपसारणपरष्वेन विनियोग उपदर्शितः तत्तद्रो ` गकारणव्वेन निरसनीयतयाऽथर्वादिमन्त्रेषु निर्दिष्टा नानाजा-

तीयङ्कभ्याद्योऽपि रोगकारणीभूतरक्तोभूतादिपर इत्यपि. केषा. च्िद्धिचारोऽस्ति -ते रोगवीजाणुकीरा रक्तोभूताद्यो वेस्यु- भयथाऽपि सम्भवन्ति त्रिशिरखिपादस्करोचनादिरूपेणः उवरादिरोगाणां मूतंयो अन्थकृद्धिरस्टिखिता दश्यन्ते, यास्त- निनिदानभूतानां रक्तप्श्चतीनां बीजाणुकीटानां वा - रूपाण्य+

ध्यारोप्य कर्पिता अपि सम्भवन्ति अद्यते सूचमवीक्षण- यन्त्रेरवेक्षणे तेषु तेषु रोगेषु . विचित्रविभिन्नाङ्कतयो ` रोग

बीजाणुकीटा उपलभ्यन्ते एवंविधान्भीषणाङृतीन्‌ कीटाणूनः न्तरशोपर्डधवद्धिः पुरातने्म॑हर्ष्यादिभिस्तेषां रकज्ञोरूपेण वर्णनं विहितं किम ! भद्यापि पवंतीयादिजातिषु उवरादीनां. भूतादि,

जन्यत्वमङ्गीक्कत्य अपामा नप्राण्यन्तरसंक्रामणवबङिदानाद्यो

माभ्तिका उपचाराः ` प्रायो विधीयन्ते, सफरूतायुपयान्ति च.# अध्यसवे फाचिक्कञ्यवहाररूपेण दृश्यमाना अपीदशा- उपाया. निमरखाः, अगिं ज्ञु प्राच्चीनवेदिकावस्थात अरभ्येवानुवत॑मानां

विच्छिक्नविकराङ्गेन केनापि सूपेणावशिष्यन्ते इस्यभ्यवसातुं

हवाक्यते। ददशो मान्त्िक्रप्रक्रियासंवलितो भेषञ्यविषरयो केवर प्राचीनभारत एव, अपि तु प्राचीनमिश्रपाश्चात्यदेशेषु

उत्तरामेरिकापयन्तदेशान्तरेष्वपि भासीदिति तत्तदीयपूर्वदृत्ता- नुसन्धानतः रफुदीभवति

आथवंणसम्प्रदाये केवर मान्त्रिकी भूतविद्येव रोगनिरख- नोपाय आसीदिति केषाच्चिष्िचारो सर्वाश तः स्थिरी भवति

दिके समये मिभ्याहारव्यवहारा इव पापामि भूतप्रेतादथो

गण्डमाायां शङ्कं षष्ठा ठेपनं, जलौकां संस्ञ्य रुधिरप्रवाहणं, | रद्वादिदेवकोपा अपि रोगहेतुतया, ओषधविशेषाणां प्रयोगा ` इव तत्तदेवतानामाराधनेन प्रसादनानि,<